
51 हजार की माली बनी आकर्षण का केंद्र, हजारों श्रद्धालुओं ने टेका माथा, देवता की भव्य छड़ी यात्रा, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और रोमांचक दंगल ने मेले को बनाया यादगार
समाचार दृष्टि ब्यूरो / राजगढ़
चूड़ेश्वर महाराज की पावन तलहटी में स्थित कुफर-जोहड़ थनोगा (चुरवाधार) में आयोजित ऐतिहासिक स्त्रोन (शनोल) मेला इस वर्ष भी श्रद्धा, आस्था, लोक संस्कृति और पारंपरिक खेलों का भव्य संगम बनकर संपन्न हुआ। मेले में हिमाचल सहित विभिन्न राज्यों से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने स्त्रोन देवता के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की। पूरे दिन धार्मिक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और रोमांचक दंगल प्रतियोगितियों ने मेले में पहुंचे लोगों को मंत्रमुग्ध किए रखा।
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मेले का शुभारंभ मुख्य अतिथि अक्षय वर्मा, प्रबंध निदेशक, वर्मा ज्वैलर्स सोलन ने किया, जबकि दिल्ली फूल मंडी के आढ़ती परवेश विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने मेले की समृद्ध परंपरा और स्थानीय संस्कृति को संरक्षित रखने में ग्रामीणों और मेला समिति के प्रयासों की सराहना की।
सुबह स्त्रोन देवता की विधिवत पूजा-अर्चना और हवन के साथ धार्मिक कार्यक्रमों का शुभारंभ हुआ। इसके बाद देवता की पवित्र छड़ी की भव्य शोभायात्रा मंदिर से मेला मैदान तक निकाली गई। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर धुन, जयघोषों और भक्तिमय वातावरण के बीच निकली इस शोभायात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए और पूरे क्षेत्र में आस्था का अनुपम दृश्य देखने को मिला।
मेले में स्थानीय कलाकारों ने हिमाचली लोक संस्कृति से ओत-प्रोत रंगारंग प्रस्तुतियां देकर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। लोकगीतों और पारंपरिक नृत्यों ने मेले की सांस्कृतिक गरिमा को और भी बढ़ा दिया।
मेले का सबसे बड़ा आकर्षण पारंपरिक दंगल प्रतियोगिता रही, जिसमें हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली से पहुंचे नामी पहलवानों ने अपने दांव-पेंच का शानदार प्रदर्शन किया। शाम को आयोजित 51 हजार रुपये की सबसे बड़ी माली ने दर्शकों में जबरदस्त रोमांच भर दिया। इस मुकाबले में हरि पहलवान (चंडीगढ़) ने आशीष पहलवान (दिल्ली) को पराजित कर विजेता बनने का गौरव हासिल किया।
इसके अलावा 21 हजार रुपये की माली के मुकाबले में अमनदीप पहलवान ने जीत दर्ज की, जबकि 11 हजार रुपये की हिमाचली माली में चेतन पहलवान (कंडा) ने सूरज पहलवान (बोहली) को हराकर खिताब अपने नाम किया। अखाड़े में हुए रोमांचक मुकाबलों ने देर शाम तक दर्शकों को अपनी सीटों से बांधे रखा।
नेहरपाब और शलाणा पंचायतों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित यह ऐतिहासिक मेला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक खेलों के संरक्षण का भी सशक्त माध्यम बनकर सामने आया। मेले के समापन पर स्त्रोन देवता की पवित्र छड़ी को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पुनः मंदिर में स्थापित किया गया।
मेला समिति ने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी श्रद्धालुओं, ग्रामीणों, प्रशासन, अतिथियों और स्वयंसेवकों का आभार व्यक्त किया।
हर वर्ष की तरह इस बार भी ऐतिहासिक स्त्रोन (शनोल) मेला यह संदेश देकर संपन्न हुआ कि हिमाचल की धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और पारंपरिक खेल आज भी लोगों के दिलों में उतनी ही मजबूती से जीवित हैं।
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