
राजगढ़ में हुई सैंकड़ों कार्यकर्ताओं ने दयाल प्यारी को टिकट देने पर अपनी ही पार्टी को घेरा, करीब 1000 कार्यकर्ता कांग्रेस को देंगे इस्तीफा
सैंकड़ों समर्थकों के साथ 25 को गंगुराम मुसाफिर सराहाँ में नामांकन करेंगे दाखिल
समाचार दृष्टि ब्यूरो/सराहाँ
पच्छाद से टिकट न मिलने पर अब मुसाफिर बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ सकते हैं। राजगढ़ में संम्पन्न हुई बैठक में उनके सैंकड़ों समर्थकों ने हर हालात में चुनाव लड़ने के लिए एक जुटता दिखाई हैं। सैंकड़ों पार्टी कार्यकर्ताओं ने कहा कि यदि कांग्रेस हाई कमान टिकट बदलकर मुसाफिर को देते हैं तो वह मुसाफिर को आजाद उम्मीदवार चुनाव में उतारेंगे।
बता दें कि टिकट को लेकर भाजपा से आई दयाल प्यारी और मुसाफिर में द्वन्द चला हुआ था जिस पर कांग्रेस का टिकट लेने में दयाल प्यारी कामयाब हो गयीदयाल प्यारी ने 21 को कांग्रेस से अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है। इससे नाराज मुसाफिर ने अब 40 साल बाद कांग्रेस से बगावत शुरू कर दी है और बतौर निर्दलीय अब चुनाव लड़ने जा रहे हैं।
पच्छाद विधानसभा क्षेत्र से गंगूराम मुसाफिर 1982 से लगातार चुनाव लड़ रहे हैं। 40 साल बाद यह पहला मौका है जब मुसाफिर को कांग्रेस से टिकट नही मिला है। टिकेट को लेकर लंबी जद्दो जहद के बाद भी यहां से साल भर पहले भाजपा से कांग्रेस में आई दयाल प्यारी को कांग्रेस हाई कमान ने टिकेट दे दिया। टिकट फाइनल होने के बाद नाराज हुए गंगुराम मुसाफिर 40 वर्ष बाद कांग्रेस से बागी हो गए हैं। गंगूराम मुसाफिर की पैरवी कर रहे कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों ने शनिवार को राजगढ़ में बैठक की। बैठक के दौरान सभी कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस हाईकमान से टिकट बदलकर गंगूराम मुसाफिर को टिकट देने की मांग की।
ब्लोक कांग्रेस पच्छाद के पूर्व अध्यक्ष बेलीराम शर्मा समेत सैंकड़ो पदाधिकारियों ने कहा कि 25 अक्टूबर तक टिकट फाइनल नहीं होता है तो करीब 1000 पदाधिकारी व कार्यकर्ता पार्टी से इस्तीफा देंगे। यही नही उन्होंने चेताया कि यदि ऐसा नही किया गया तो गंगूराम मुसाफिर को निर्दलीय मैदान में उतारा जाएगा।
बता दें कि गंगूराम मुसाफिर ने अपना राजनैतिक सफ़र बतौर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में ही शुरू किया था। 1982 में गंगूराम मुसाफिर ने वन विभाग की नौकरी से इस्तीफा देकर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर अपना पहला चुनाव लड़ा था। उस समय कांग्रेस सरकार के पास बहुमत न होने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने गंगूराम मुसाफिर को कांग्रेस में एसोसिएट विधायक के तौर पर शामिल किया और उन्हें राज्य वन मंत्री का पद भी दिया गया था। मुसाफिर 1985 से लेकर 2019 तक कांग्रेस के टिकट पर लड़ते रहे। भाजपा छोड़कर को कांग्रेस में आई दयाल प्यारी का पच्छाद कांग्रेस मंडल ने शुरू से ही विरोध किया।
यही नही पच्छाद मंडल सदस्यों ने गंगुराम मुसाफिर के नेतृत्त्व में शिमला जाकर राजीव भवन में भी तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर के समक्ष दयाल प्यारी को कांग्रेस में मिलाने के विरोध में प्रदर्शन किया था। इसके बाद हिमाचल कांग्रेस प्रभारी राजीव शुक्ला ने पच्छाद कांग्रेस मंडल की कार्यकारिणी को ही भंग कर दिया था। कांग्रेस हाईकमान ने 17 अक्टूबर को जब 46 प्रत्याशियों की घोषणा की तो गंगुराम मुसाफिर का टिकट काटकर दयाल प्यारी को दे दिया गया।
गंगूराम मुसाफिर 7 बार पच्छाद विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे। मुसाफिर 1982 में निर्दलीय विधायक रहे उसके बाद 1985 से लेकर 2007 तक कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। इस दौरान गंगूराम मुसाफिर कांग्रेस सरकार में राज्य मंत्री वन एवं उद्योग, राज्यमंत्री शिक्षा मंत्री, कैबिनेट मंत्री राज्य सहकारिता विभाग, कैबिनेट मंत्री परिवहन, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज तथा 2003 से 2008 तक हिमाचल प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे।
वर्ष 2009 में कांग्रेस पार्टी ने उन्हें शिमला संसदीय क्षेत्र से लोकसभा प्रत्याशी बनाया। इस चुनाव में गंगूराम मुसाफिर भारी मतों से हार गए थे। विधानसभा चुनाव 2012, 2017 व उपचुनाव 2019 भी मुसाफिर लगातार 3 बार हार चूके हैं। अब 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का टिकट न मिलने से नाराज मुसाफिर एक बार फिर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतरने जा रहा हैं।




